रविवार, फ़रवरी 18, 2018

मेड इन इण्डिया डिफॉल्टर

उतने पांव पसारिये, जितनी लंबी सौर

ये कहावत उस समय की है जब हम बड़े हो रहे थे. हमें समझाया जाता है कि पहले बचाओ फिर खर्च करो. तब इन्सान मकान और कार आदि उस समय लेता था जब उसकी उन सुविधाओं को एन्जॉय करने की उम्र गुजर रही होती थी. सारा जीवन किफायत करते करते, अपने सभी सपनों को मारते सिर्फ एक बचत की मानसिकता के साथ गुजार देते थे ताकि अगली पीढ़ी के लिए विरासत में कुछ सुविधायें छोड़ जायें. सब प्रयास अगली पीढ़ी के लिए होता था. लोग कठहल और आम के पेड़ अहाते में लगवाते ही इसलिए थे कि अगर नाती पोते नालायक निकल गये तो भी बगिया उनके परिवार को संभाल देगी.
वक्त और सोच का आधार बदल गया है. आज का युवा मेहनत ही इसलिए करने को तैयार होता है क्यूँकि उसके सिर पर ईएमआई का भूत नाच रहा है. यह नई सोच है नई पीढ़ी की. आज कहावत बदल कर यूँ हो गई है कि
उतने पांव पसारिये, जितनी ईएमआई होय...
याने कि घर भी हो, कार भी हो, वेकेशन भी हो, हर लक्जरी हो..ध्यान बस यह रहे कि इतनी कमाई हो जाये कि ईएमआई समय पर भर पायें. इस भागम दौड़ में वो यह भी भूल जाता है कि कल को नौकरी न रही तो क्या? चलो, अपनी क्षमाताओं पर अति आत्म विश्वास हो कि यह नहीं तो दूसरी नौकरी तुरंत ही मिल जायेगी मगर अपनी साँसों पर आत्म विश्वास कैसा? कौन जाने अगली आये कि न आये मगर फिर भी..यह ईएमआई आधारित जीवनी..मेरे गले से तो अब भी नहीं उतरती है...बच्चे समझते हैं कि हम सठिया गये हैं और नये जमाने के चाल चलन की समझ खो बैठे हैं...
खैर आज की तो सरकार भी ईएमआई वाली मानसिकता से चल रही है कि यह महिना निकल जाये, फलां चुनाव निकल जाये तब आगे की देखें. लम्बे समय की कोई योजना ही हाथ में नहीं है सब दिवा स्वप्न देख रहे हैं और सब दिवा स्वप्न दिखा रहे हैं.
हमारे समय में बैंक से लोन लेना ही समाज में बदनामी का कारण बन जाया करता था कि फलाना कर्जे में है..बस फोकट की रईसी झाड़ता है..उस पर से अगर लोन न चुका पाओ तो शहर भर डुगडुगी पिटने और समाज में बदनामी के डर से बंदा आत्म हत्या ही कर लेता था. आज जो डिफॉल्टर होना स्टेटस सिंबल बना हुआ है वो हमारे समय में आत्म हत्या कर लेने सबब हुआ करता था.
अमीर और गरीब के बीच आज बस यही फरक है. एक अमीर डिफॉल्टर आज भी फक्र से अपने डिफॉल्ट को तमगे की तरह लगा कर सर उठा कर समाज में रईसी का परचम लहराता है और एक गरीब किसान, छोटे से लोन के चक्कर में पेड़ पर लटक जाता है.
वक्त अपनी करवट अपने हिसाब से लेता है और चीजों के मायने बदल जाते हैं.
आज पूरे देश की आम जनता शायद एक भी ऐसे किसान का नाम न जानती होगी जो लोन न चुका पाने के कारण आत्म हत्या कर बैठा मगर हर बंदा उनके नाम जरुर जानता होगा जो लोन न चुका पाने के कारण विदेश में जा बैठे..चाहे वो ललित मोदी है, विजय मलैय्या हो या आज का नया सितारा निरव मोदी हो..सभी सरकारी संरक्षण प्राप्त हैं मानो कि जेड सिक्यूरिटी मिली हो और विदेश में सुरक्षित हैं. गाँधी के चश्में की तरह मानो तो या इन्हें कोहिनूर मान लो तो..जाने कब कौन इनको भारत वापस लायेगा...और लायेगा भी तो कहीं गाँधी के चश्में कि तरह विजय मलैय्या बन कर न ले आये तो ही भला..वरना तो बात अंगूठे के घाव पर बैण्ड एड लगा कर हाथ काट लेने जैसी हो जायेगी.
इनके चलते आज के वक्त में देश में हाल तो यह हो गया है कि अगर बैंक लोन लेने जा रहे हो तो मित्र पूछते हैं कि विदेश जाकर बस जाने का इरादा है क्या? और विदेश बस जाने के लिए इमिग्रेशन लेने के लिए एप्लाई करो तो पूछते हैं कि बैंक से लोन लेने का इरादा है क्या?
अपनी क्षमताओं और नॉलेज के आधार पर विदेश जाकर बस जाने का रास्ता तो यूँ भी ट्रम्प बंद करने की फिराक में है ही..अमरीका फर्स्ट के नारे के साथ...तो अब विदेश जाकर बसने के लिए एक ही रास्ता बच रहेगा और वो होगा हमारे देशी नारे के साथ...मेक इन इण्डिया वाले का...कि बस भारत में इत्ते बड़े डिफॉल्टर बन जाओ..कि विदेश में आकर आराम फरमाओ..और खुद को मेड इन इण्डिया डिफॉल्टर का खिताब पहनाओ!!
-समीर लाल समीर’     
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में फरवरी १८, २०१८ के अंक में प्रकाशित:

 
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शनिवार, फ़रवरी 10, 2018

हमारे जमाने की बात ही कुछ और थी..


उत्सवधर्मी हमारा देश है और ईश्वर की महान कृपा है कि हमारे देश में उत्सवों के कारणों की कमी भी नहीं है. त्यौहारों एवं पर्व विशेष पर मनाये जाने वाले उत्सव ही हमें परिभाषित करते हैं. शायद यही हमें हर हाल में जी लेने का संबल भी देते हैं.
कभी सोचता हूं कि यूं कहूँ कि हम तो वो शै हैं जानी, जो पर्व भी खुद घोषित करते हैं और उत्सव भी खुद मनाते हैं.
इस सीरिज़ में वो पर्व आते हैं जो सत्ताधारी राजनितिक दल अपनी राजनितिक आस्था प्रकट करने के लिए घोषित करते हैं..नाम लेना उचित न होगा इन पर्वों का..कौन गाँधी, कौन सावरकर..सब जरुरी हैं देश के इतिहास को पढ़ते हुए.
कुछ त्यौहार सदियों पुराने पुरातन काल से चले आ रहे हैं और बिना बहुत ज्यादा सोचे समझें हम उन्हें मनाते चले जा रहे हैं. काल के अनुरुप इनके रुप बदलते गये मगर त्यौहार तो वही रहे. दिये की जगह झालर वाली लाईटों ने ले ली. पटाखों की जगह अब सरकारी आदेशों ने अपने धमाके के आगे इनके धमाके को बंद करा कर ले ली है. धुँआ, जो कभी कीड़े मकोड़े और मच्छरों को भगाने और मारने में सहायक माना जाता था, आज प्रदुषण रुपी दानव का रुप धर कर इन्सानों को निगलने को अमादा है.
कुछ त्यौहार ऐसे भी हैं जो पहले थे तो मगर आंचलिक स्तर पर. जैसे कि छठ, लोहड़ी, करवाचौथ, संक्राति की पतंगबाजी. इनको राष्ट्रीय स्तर का बनाने का पूरा श्रेय टीवी के सीरियलों को जाता है. जिस तरह से इन त्यौहारों ने टीवी के माध्यम से लोकप्रियता हासिल की है, न जाने कितने ही लोकल त्यौहार आज इस इन्तजार में लगे होंगे कि हे एकता कपूर, हमें भी दिखला दो न त्यौहार सा मनता हुआ अपने सीरियल में प्लीज.
मगर टीवी के अपने नखरे हैं, कहो तो रामदेव बना दें, या राम रहिम या आशाराम बना कर जेल पहुँचा दें. यही सोच कर कई त्यौहार भी डर के मारे चुप्पी साध जाते होंगे. दक्षिण के जल्लीकट्टू का भी राष्ट्रीय स्तर पर आते आते न आ पाना, इसी कड़ी से जोड़ कर देखा जा सकता है.
इनके इतर कुछ त्यौहार बस कुछ दशक पुराने हैं हमारे देश में. ज्यादा उम्र नहीं हुई है हमारे देश में उन्हें पधारे. जैसे कि वेलेन्टाईन डे, मदर्स डे, फादर्स डे, हेलोविन आदि आदि. ये पश्चिम से पधारे हैं तो ताम झाम भी वैसे ही है. गरीब के बस के नहीं हैं ये. बस, संभ्रांत और फेशनेबल लोगों के हिस्से में आये हैं. बाजार की देन यह त्यौहार बाजार के लिए ही हैं. बाजार की चमक दमक इनके लिए है..और चमक दमक के हकदार वो अमीर तबका ...इसे मान्यता देता है.
वेलेन्टाईन डे से याद आया कि अब तो इसे मनाते हुए हमारे देश में एक अरसा हो गया. अब इसे मनाने वालों की श्रेणी में वैसे भी लोग आ चुके हैं जो इसे अब नहीं मनाते. अब वे बुजुर्ग टाईप हो लिए हैं.
जैसे आम बुजुर्ग कहता है कि अब जमाना पहले जैसा नहीं रहा. हमारे समय तो बात ही कुछ और थी. घी कटोरी से मूँह लगा कर पीते थे. अब तो न धी सच्चा और न शरीर ही ऐसा है कि शुद्ध घी पचा पाये. कोई दिखा दे आज एक कटोरी घी पी कर, न हगहगी लग जाये तो नाम बदल देना हमारा.
जमाना और समय बदलने की जब भी बात आती है मुझे शराबी वाले अमिताभ बच्चन का वो डायलॉग जरुर याद आता है:
अब तो उतनी भी मयस्सर नहीं मयख़ाने में
जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में...
ये शेर तो बहुत से उन राजनितिक दलों पर लागू होता है जो कि कभी जितनी सीटें समझौते में दूसरे दलों को लड़ने के लिए छोड़ दिया करते थे, आज उससे भी कम लिए खुद बैठे हैं, चाहें लोकसभा हो या विधान सभा. वक्त सबको सबक सिखा ही जाता है जिन्दगी जीने का.
तो भूतपूर्व वेलेन्टाईनबाज जो अब इसे मनाने के क्षेत्र में बुजुर्ग होकर बाहर हो लिए हैं, उनको कहते सुनते हैं कि हमारे समय में वेलेन्टाईन डे एकदम ताजा ताजा आया था बाजार में. हम तो एक दिन में तीन तीन पतों पर गुलाब भिजवाते थे और तीनों गुलाब अलग अलग किताबों में सूखे हुए फूल किताबों में मिले तक शिद्दत से पाये जाते थे.
अब तो न वो पते हैं और न किताबें. अब का जमाना देखो कि एक ही पते पर चार चार गुलाब पहुँच रहे हैं और किताब का स्थान नाली ने ले लिया है. सब बहा दिया जा रहे हैं. मलैच्छ हो गया है बाजार.
मने कि पुरुष प्रधान मानसिकता से उभर कर, स्त्री की अपनी पसंद नापसंद की मानसिकता को स्वीकार न कर पाने को भी बाजार पर थोप देने वाले ये बुजुर्ग भी बाजार में मिलने लगे हैं..है तो अफसोसजनक मगर है तो!
बाजार बहुत आगे बढ़ गया है. कुछ और नये त्यौहार आयेंगे आने वाले समय में..यह अनवरत है, मगर तब तक पुराने त्यौहारों में कुछ और बुजुर्ग पैदा हो जायेंगे.
यही तो चक्र है जो सदा चलता रहेगा और आने वाला जमाना भी यही कहता रहेगा कि अब जमाना पहले जैसा नहीं रहा.
सच में देखा जाये तो कुछ भी बदलता नहीं.एक मृग मरिचिका है हर जमाने की...जो आज मन की बात है वो कल बात मन की होकर सुनाई जायेगी और हम उत्सवधर्मी मानसिकता के वाहक, हर हाल में उत्सव मनाते रहेंगे...प्रसन्न होते रहेंगे.
यही हमारे जीने का तरीका है!
-समीर लाल समीर

भोपाल के सुबह सवेरे में रविवार फरवरी ११, २०१८ में प्रकाशित:
http://epaper.subahsavere.news/c/26148349




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गुरुवार, फ़रवरी 08, 2018

अगर घर वालों के टेरर में न आए होते तो आज पकौड़े बेच कर फक्र कर रहे होते

इतना जीवन बेवजह हीन भावना पाले गुजर गया. शादी हुई तो पत्नी प्रगतिशील एवं नारी सशक्तिकरण की भरपूर समर्थक तो क्या कहें, नेता ही कहना उचित होगा, मिली. समर्थक तो आज इनके हैं, कल टूट कर दूसरे पाले में जाकर खड़े हो जायेंगे. मगर सच्चा नेता अपनी पहचान बनाये रखता है. मैं उन्हें नेता मानने से सिरे से इन्कार करता हूँ जो आज कांग्रेसी हैं, कल जे पी के साथ और परसों बीजेपी के साथ. वे नेता का मुखौटा पहने बस एक अवसरवादी हैं जो निजी स्वार्थ हेतु किसी से भी हाथ मिला लें, किसी को भी गले लगा लें. हमारी पत्नी सच्ची नेता है नारी सशक्तिकरण की. इनके रहते मजाल है कि पुरुषों को जरा भी एक्स्ट्रा एडवान्टेज सिर्फ इसलिए मिल जाये क्यूँकि वह पुरुष हैं.
अब नारी सशक्तिकरण और समानता की बात जहाँ आ खड़ी हो तो वहाँ ये तो नहीं हो सकता कि पूर्व मान्यताओं के हिसाब से घर और बाहर के कामों और दायित्वों का बटवारा हो जाये. उसी के खिलाफ ही तो सारी आवाज है और फिर जब दोनों बराबरी से कमाने जाते हैं तो घर क्या और बाहर क्या?
तो बच रहा आपस में बैठकर बातचीत, चिल्ला चपट, मूँह फुलाना, आँसू, जूतम पैजार मने कि पूरा संसद के सत्र का माहौल और फायनली यह कि चलो, सारे कामों की पर्ची बना लेते हैं, फिर एक एक करके खींचते है, जो जिसके हिस्से पड़ जाये वो वह कार्य करेगा. हम तो इसी में खुश थे कि पेट में बच्चा कौन रखेगा, उसकी पर्ची न बना डाली इनने, वरना कहीं वो हमारे हिस्से आ गिरती तो इनके नारीवादी झंड़े के आगे तो यूँ भी विज्ञान और प्रकृति नतमस्तक है, हमारी क्या मजाल!!
इसी परची खींचने के चक्कर मे हमारे हिस्से अन्य कार्यों के साथ साथ घर में झाडू लगाना भी आ गया, रास्ता तो कोई था नहीं, मूँह अंधेरे ही मंजन करने के भी पहले झाडू लगाकर बाहर बरामदे तक सफाई कर आते. मोहल्ले के लोग तब सोये ही होते और अंधेरे में कोई देख न पाता तो इज्जत बची रही. मगर एक डर हमेशा सताता रहा कि कहीं लोगों ने देख लिया तो भद्द उतर जायेगी कि ये देखो, झाडू लगा रहे हैं? हमारे समय में ऐसे लोगों को मौगड़ा कहते थे जो बीबी की जी हजूरी बजाते थे या चाय शाय बनाकर बीबी को पिलाया करते थे. बस, मोहल्ले में मौगड़ा न कहलाये जायें, इसी जुगत में नित जिन्दगी टेंशन में गुजरती रही.
यह तो सर्व विदित है कि पिछले ७० सालों में जो देश में नहीं हुआ वो सन २०१४ के बाद हुआ. मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ. यह वो ऐतिहासिक साल है, जब देश को ऐसा प्रधान मिला जिसने ऐसा राष्ट्र व्यापी अभियान चलाया कि हाथ में झाडू उठाकर सफाई करना फैशन सिम्बल बन गया. फोटो ऑप में टॉप नंबर पर झाडू लेकर सफाई करते हुए सेल्फी हो गई. झाडू लगाना मौगड़ई का ध्योतक न होकर सम्मान का विषय हो गया. हालात यहाँ तक पहुँच गये कि हम बरामदा साफ कर चुके हों तो भी पत्नी अपनी सहेलियों के साथ सड़क से कचरा उठाकर वापस बरामदे में बिखराती और उसे साफ करते हुए सेल्फी उतरवा कर अखबारों में छपवाती.
सुबह मूँह अंधेरे उठने के आजीवन जंजाल से मुक्ति मिली. कोई देख न ले वाले भय का माहौल खत्म हुआ. मौगड़ाई सम्मान में बदली. खैर, बदली तो लुच्चई भी संतई में मगर उस पर बात इस आलेख के सिलेबस से बाहर है.
इसे कहते हैं आमूलचूल परिवर्तन. अप साईड डाऊन कर डालने वाला नेता. सारी सोच ही बदल डाली. मानसिक ढ़ांचा बदल डाला. जीवन जीने की शैली और नजरिया बदल डाला. आज हर हाथ, झाडू की बात!! अब झाडू लगाने में कोई नहीं शरमाता. हालांकि अन्य अप साईड डाऊन प्रयोगों के कारण कईयों के पास झाडू लगाने के सिवाय और कोई रास्ता भी नहीं बच रह गया है मगर फिर भी. जो क्रेडिट बनती है वो देनी चाहिये. नहीं भी दोगे तो भी ले ही लेंगे तो बेहतर है कि दे ही दो.
इन्हीं आमूलचूल परिवर्तनों की सुनामी में एक ताजी लहर ने फिर मुक्त किया एक जीवन भर के भ्रम से. बचपन से घर में जब कभी पढ़ने के लिए डांट पड़ती तो हमेशा लताड़ा जाता कि दिन भर आवारागर्दी करते रहते हो, पढ़ाई में तो मन ही नहीं लगता. कहीं कोई नौकरी नहीं मिलेगी. बैठ जाना नुक्कड़ पर पकोड़े का ठेला लगा कर. दिन भर बस पकोड़ी छानना.
बालमन घबरा जाता. मोहल्ले के नुक्कड़ पर घंसु का पकोड़ी का ठेला था, बस वही घंसु का चेहरा घूम जाता आँख के सामने. कभी नगर निगम वाले ठेला उठा के ले जाते तो कभी कोई पुलिस वाला उसे हफ्ता न देने और फ्री मे न खिलाने के लतिया रहा होता, कभी कोई दारुखोर रात में दारु के साथ खाये उधार पकोड़े के पैसे मांगने पर गरिया रहा होता और हाथ जोड़े उसके मूँह से हमेशा एक ही वाक्य सुनाई देता कि मुझ गरीब पर ऐसा अत्याचार न करो!! जब दिखा, हमेशा दयनीय स्थिति में ही दिखा. वही गंदा सा पजामा और घीसे हुए कालर की कमीज. वहीं पास में एक कमरे की छपरी में रहता था किराये पर.
सोचते कि अपनी यह हालत होने वाली है तो रुह कांप जाती. उस दिन जरुर थोड़ी बहुत पढ़ाई कर लेते. फिर अगले दिन भूल जाते..फिर कुछ दिन में पकोड़े बेचने की बात याद दिलाई जाती. इसी इसी के चलते सीए बन गये तब जाकर श्रीमुख से पता चला कि अगर पकोड़े बेचते होते तो आज रोजगार प्राप्त बंदे का दर्जा मिला होता. सीए को तो वे पहले ही उड़ा चुके हैं यह बोल कर कि आप के करम मुझे पता हैं कि आप देश के लिए काम करते हो कि उन काला बाजारियों के लिए. शरम से सर झुक गया. मगर सोचता हूँ कि अगर घर वालों के टेरर में न आये होते तो आज पकोड़े बेच रहे होते और इस बात को फक्र से कहते कि देखो, एक हम हैं जिसका रोजगार ऐसा है जिस पर देश का प्रधान गर्व करता है.
मगर हाय री किस्मत!! जब भाग्य में यश न बदा हो तो कोई क्या कर सकता है!
-समीर लाल ’समीर’  
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के फरवरी ९, २०१८ अंक में प्रकाशित:

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